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Health: 20 साल बाद एंटीबायोटिक दवाओं का नहीं होगा असर, संक्रमण बनेगा अधिक मौत की वजह, पढ़ें रिपोर्ट


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20 साल बाद एंटीबायोटिक दवाओं का असर नहीं रहेगा। ऐसे में सबसे अधिक मौत संक्रमण से होंगी। इसकी मुख्य वजह वर्तमान में एंटीबायोटिक दवाओं का गलत व अनियंत्रित प्रयोग है। एंटीबायोटिक प्रतिरोधी बनने का खतरा बढ़ता जा रहा है। भविष्य में संक्रमण से लड़ने के लिए एडवांस एंटीबायोटिक दवाएं नहीं हैं। स्थिति यह तक हो सकती है कि आने वाले समय में मामूली चोट का संक्रमण भी व्यक्ति की मौत का कारण बन सकती है। यह अंदेशा जताया है पीजीआईएमएस के पीसीसीएम विभागाध्यक्ष डॉ. ध्रुव चौधरी ने। 

डॉ. ध्रुव चौधरी ने शुक्रवार को अमर उजाला से विशेष बातचीत में बताया कि पीजीआईएमएस में दो दिन की विशेष वर्कशॉप होने जा रही है। इसमें इस अहम विषय पर प्रमुखता से चर्चा होगी, ताकि देश भर के डॉक्टरों को संदेश जाए कि एंटीबायोटिक का गलत प्रयोग न करें। आने वाले दो दशक बाद चिकित्सा विज्ञान के लिए यह सबसे बड़ा चैलेंज होगा।

क्योंकि देश में बिना जरूरत के एंटीबायोटिक दवाओं का प्रयोग हो रहा है। कई मरीज स्वयं एंटीबायोटिक लेते हैं तो कुछ डॉक्टर या झोलाछाप बगैर जरूरत के एंटीबायोटिक दवा देते हैं। कुछ मरीजों को कम डोज की जरूरत होती है, लेकिन दी अधिक जाती है।

यह भी पढ़ें : ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान: अब बॉयलर पर नहीं चलेंगी फैक्टरियां, प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए जारी किए आदेश

इतना ही नहीं जीव-जंतुओं को भी बिना वजह इसे फूड में दिया जा रहा है, जोकि नॉनवेज के रूप में वापस मनुष्य में आ रहा है। यह खतरनाक है। शुरुआत में संक्रमण से लड़ने के लिए पेनिसिलिन नामक एंटीबायोटिक आई थी और जीवन को लगभग 25 साल बढ़ा दिया। आज अज्ञानता के चलते यह संजीवनी एंटीबायोटिक प्रतिरोधी नामक खतरे में बदलती जा रही है। 

फोर डी से ही बचाव संभव
डॉ. ध्रुव चौधरी बताते हैं कि चिकित्सक को डिजिज, ड्रग, डोज व ड्यूरेशन फोर डी पर कार्य करना होगा, तभी बचाव संभव है। इसके तहत पहले बीमारी पहचानें, फिर दवा लिखें और वह कितने समय के लिए और कितनी मात्रा में तय करना अनिवार्य है। कम-अधिक, बिना जरूरत के एंटीबॉयोटिक दवाएं लेना खतरनाक है। 

क्या है एंटीबायोटिक प्रतिरोधी?
अक्सर बैक्टीरिया एंटीबायोटिक से बचने के लिए स्वयं को बदलता है और इतना मजबूत बनता है कि उसे एंटीबायोटिक से खत्म करना मुश्किल हो जाता है। इसे एंटीबायोटिक प्रतिरोधी कहते हैं। यही वजह है कि निमोनिया, टीबी, रक्त विषक्ता और खाद्य पदार्थों से होने वाले संक्रमण को ठीक करना अब मुश्किल होता जा रहा है। ये रोग पहले कुछ ही एंटीबायोटिक से ठीक हो जाते थे, अब इन पर असर कम होता जा रहा है। 

इन बातों का रखें ध्यान

  •  डॉ. बगैर जरूरत एंटीबायोटिक न लिखें, संक्रमण के हिसाब से ही दवा लिखें
  •  सभी एंटीबायोटिक एक नहीं होती
  •  जितनी मात्रा में जितने समय में लेने को लिखा गया है उसे फॉलो करें
  •  एंटीबायोटिक की खुली बिक्री पर रोक लगे

एंटीबायोटिक का भविष्य
एंटीबायोटिक दवाओं का अंधाधुंध उपयोग देश में हो रहा है। फार्मा कंपनियां एंटीबायोटिक प्रतिरोधी बनने पर काबू पाने के लिए रिसर्च कर रही हैं। नए अपडेट की लागत अधिक आ रही है। इसे वहन करना मध्यम वर्गीय परिवार के लिए भी संभव नहीं होगा।

विस्तार

20 साल बाद एंटीबायोटिक दवाओं का असर नहीं रहेगा। ऐसे में सबसे अधिक मौत संक्रमण से होंगी। इसकी मुख्य वजह वर्तमान में एंटीबायोटिक दवाओं का गलत व अनियंत्रित प्रयोग है। एंटीबायोटिक प्रतिरोधी बनने का खतरा बढ़ता जा रहा है। भविष्य में संक्रमण से लड़ने के लिए एडवांस एंटीबायोटिक दवाएं नहीं हैं। स्थिति यह तक हो सकती है कि आने वाले समय में मामूली चोट का संक्रमण भी व्यक्ति की मौत का कारण बन सकती है। यह अंदेशा जताया है पीजीआईएमएस के पीसीसीएम विभागाध्यक्ष डॉ. ध्रुव चौधरी ने। 

डॉ. ध्रुव चौधरी ने शुक्रवार को अमर उजाला से विशेष बातचीत में बताया कि पीजीआईएमएस में दो दिन की विशेष वर्कशॉप होने जा रही है। इसमें इस अहम विषय पर प्रमुखता से चर्चा होगी, ताकि देश भर के डॉक्टरों को संदेश जाए कि एंटीबायोटिक का गलत प्रयोग न करें। आने वाले दो दशक बाद चिकित्सा विज्ञान के लिए यह सबसे बड़ा चैलेंज होगा।

क्योंकि देश में बिना जरूरत के एंटीबायोटिक दवाओं का प्रयोग हो रहा है। कई मरीज स्वयं एंटीबायोटिक लेते हैं तो कुछ डॉक्टर या झोलाछाप बगैर जरूरत के एंटीबायोटिक दवा देते हैं। कुछ मरीजों को कम डोज की जरूरत होती है, लेकिन दी अधिक जाती है।

यह भी पढ़ें : ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान: अब बॉयलर पर नहीं चलेंगी फैक्टरियां, प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए जारी किए आदेश

इतना ही नहीं जीव-जंतुओं को भी बिना वजह इसे फूड में दिया जा रहा है, जोकि नॉनवेज के रूप में वापस मनुष्य में आ रहा है। यह खतरनाक है। शुरुआत में संक्रमण से लड़ने के लिए पेनिसिलिन नामक एंटीबायोटिक आई थी और जीवन को लगभग 25 साल बढ़ा दिया। आज अज्ञानता के चलते यह संजीवनी एंटीबायोटिक प्रतिरोधी नामक खतरे में बदलती जा रही है। 

फोर डी से ही बचाव संभव

डॉ. ध्रुव चौधरी बताते हैं कि चिकित्सक को डिजिज, ड्रग, डोज व ड्यूरेशन फोर डी पर कार्य करना होगा, तभी बचाव संभव है। इसके तहत पहले बीमारी पहचानें, फिर दवा लिखें और वह कितने समय के लिए और कितनी मात्रा में तय करना अनिवार्य है। कम-अधिक, बिना जरूरत के एंटीबॉयोटिक दवाएं लेना खतरनाक है। 

क्या है एंटीबायोटिक प्रतिरोधी?

अक्सर बैक्टीरिया एंटीबायोटिक से बचने के लिए स्वयं को बदलता है और इतना मजबूत बनता है कि उसे एंटीबायोटिक से खत्म करना मुश्किल हो जाता है। इसे एंटीबायोटिक प्रतिरोधी कहते हैं। यही वजह है कि निमोनिया, टीबी, रक्त विषक्ता और खाद्य पदार्थों से होने वाले संक्रमण को ठीक करना अब मुश्किल होता जा रहा है। ये रोग पहले कुछ ही एंटीबायोटिक से ठीक हो जाते थे, अब इन पर असर कम होता जा रहा है। 

इन बातों का रखें ध्यान

  •  डॉ. बगैर जरूरत एंटीबायोटिक न लिखें, संक्रमण के हिसाब से ही दवा लिखें
  •  सभी एंटीबायोटिक एक नहीं होती
  •  जितनी मात्रा में जितने समय में लेने को लिखा गया है उसे फॉलो करें
  •  एंटीबायोटिक की खुली बिक्री पर रोक लगे


एंटीबायोटिक का भविष्य

एंटीबायोटिक दवाओं का अंधाधुंध उपयोग देश में हो रहा है। फार्मा कंपनियां एंटीबायोटिक प्रतिरोधी बनने पर काबू पाने के लिए रिसर्च कर रही हैं। नए अपडेट की लागत अधिक आ रही है। इसे वहन करना मध्यम वर्गीय परिवार के लिए भी संभव नहीं होगा।




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